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द्रोण पर्व
अध्याय ९५
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सात्यकिरु उवाच
अद्य कौरवसैन्यस्य दीर्यमाणस्य संय़ुगे |  २२   क
श्रुत्वा विरावं वहुधा सन्तप्स्यति सुय़ोधनः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति