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द्रोण पर्व
अध्याय ९५
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सात्यकिरु उवाच
अद्य मे क्रुद्धरूपस्य निघ्नतश्च वरान्वरान् |  २७   क
द्विरर्जुनमिमं लोकं मंस्यते स सुय़ोधनः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति