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द्रोण पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
ते पिवन्त इवाकाशं युय़ुधानं हय़ोत्तमाः |  ३१   क
प्रापय़न्यवनाञ्शीघ्रं मनःपवनरंहसः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति