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द्रोण पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं ते समासाद्य पृतनास्वनिवर्तिनम् |  ३२   क
वहवो लघुहस्ताश्च शरवर्षैरवाकिरन् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति