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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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वृहस्पतिरु उवाच
मरुत्तमाहुर्मघवन्यक्ष्यमाणं; महाय़ज्ञेनोत्तमदक्षिणेन |  ४   क
तं संवर्तो याजय़ितेति मे श्रुतं; तदिच्छामि न स तं याजय़ेत ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति