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द्रोण पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
तीर्णाः स्म दुस्तरं तात द्रोणानीकमहार्णवम् |  ४   क
जलसन्धवलेनाजौ पुरुषादैरिवावृतम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति