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आदि पर्व
अध्याय ९६
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वैशम्पाय़न उवाच
स्नुषा इव स धर्मात्मा भगिन्य इव चानुजाः |  ४४   क
यथा दुहितरश्चैव प्रतिगृह्य यय़ौ कुरून् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति