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आदि पर्व
अध्याय ९६
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वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोः पाणिं गृहीत्वा स रूपय़ौवनदर्पितः |  ५३   क
विचित्रवीर्यो धर्मात्मा कामात्मा समपद्यत ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति