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आदि पर्व
अध्याय ९६
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वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनः प्रतिरूपोऽसौ लव्धः पतिरिति स्थिते |  ५५   क
विचित्रवीर्यं कल्याणं पूजय़ामासतुस्तु ते ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति