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शान्ति पर्व
अध्याय ९६
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भीष्म उवाच
नाश्वेन रथिनं याय़ादुदिय़ाद्रथिनं रथी |  १०   क
व्यसने न प्रहर्तव्यं न भीताय़ जिताय़ च ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति