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शान्ति पर्व
अध्याय ९६
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भीष्म उवाच
यो वै जय़त्यधर्मेण क्षत्रिय़ो वर्धमानकः |  १५   क
आत्मानमात्मना हन्ति पापो निकृतिजीवनः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति