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अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
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वसिष्ठ उवाच
अस्वाध्याय़परो लोके श्वानं च परिकर्षतु |  १७   क
पुरे च भिक्षुर्भवतु यस्ते हरति पुष्करम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति