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अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
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धुन्धुमार उवाच
अकृतज्ञोऽस्तु मित्राणां शूद्राय़ां तु प्रजाय़तु |  २१   क
एकः सम्पन्नमश्नातु यस्ते हरति पुष्करम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति