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अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
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जमदग्निरु उवाच
अनध्याय़ेष्वधीय़ीत मित्रं श्राद्धे च भोजय़ेत् |  २५   क
श्राद्धे शूद्रस्य चाश्नीय़ाद्यस्ते हरति पुष्करम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति