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अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
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पर्वत उवाच
ग्रामे चाधिकृतः सोऽस्तु खरय़ानेन गच्छतु |  ३४   क
शुनः कर्षतु वृत्त्यर्थे यस्ते हरति पुष्करम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति