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अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
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इन्द्र उवाच
आख्यानं य इदं युक्तः पठेत्पर्वणि पर्वणि |  ५२   क
न मूर्खं जनय़ेत्पुत्रं न भवेच्च निराकृतिः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति