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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
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जनमेजय़ उवाच
कोऽसौ नकुलरूपेण शिरसा काञ्चनेन वै |  १   क
प्राह मानुषवद्वाचमेतत्पृष्टो वदस्व मे ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति