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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
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जनमेजय़ उवाच
स तान्प्रसादय़ामास शापस्यान्तो भवेदिति |  १२   क
तैश्चाप्युक्तो यदा धर्मं क्षेप्स्यसे मोक्ष्यसे तदा ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति