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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
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जनमेजय़ उवाच
तैश्चोक्तो यज्ञिय़ान्देशान्धर्मारण्यानि चैव ह |  १३   क
जुगुप्सन्परिधावन्स यज्ञं तं समुपासदत् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति