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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्क्षीरं स्थापय़ामास नवे भाण्डे दृढे शुचौ |  ४   क
तच्च क्रोधः स्वरूपेण पिठरं पर्यवर्तय़त् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति