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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
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जनमेजय़ उवाच
साक्षाद्दृष्टोऽसि मे क्रोध गच्छ त्वं विगतज्वरः |  ९   क
न ममापकृतं तेऽद्य न मन्युर्विद्यते मम ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति