वन पर्व  अध्याय ९६

अगस्त्य उवाच

वित्तकामाविह प्राप्तौ विद्ध्यावां पृथिवीपते |  ९   क
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान्संविभागं प्रय़च्छ नौ ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति