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कर्ण पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
दुर्योधनस्य कर्णस्य भोजस्य कृतवर्मणः |  ४४   क
मद्रराजस्य शल्यस्य द्रौणेश्चैव कृपस्य च ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति