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विराट पर्व
अध्याय ५५
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अर्जुन उवाच
यत्सभाय़ां स्म पाञ्चालीं क्लिश्यमानां दुरात्मभिः |  ४   क
दृष्टवानसि तस्याद्य फलमाप्नुहि केवलम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति