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भीष्म पर्व
अध्याय ९६
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सञ्जय़ उवाच
प्रहरन्सर्वशत्रुभ्यः पाण्डवानां महारथः |  ११   क
अदृश्यत महेष्वासः सवज्र इव वज्रभृत् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति