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भीष्म पर्व
अध्याय ९६
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सञ्जय़ उवाच
कार्ष्णिश्चापि मुदा युक्तः प्रगृहीतशरासनः |  २८   क
नृत्यन्निव रथोपस्थे तद्रक्षः समुपाद्रवत् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति