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भीष्म पर्व
अध्याय ९६
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सञ्जय़ उवाच
विरथांश्च महेष्वासान्कृत्वा तत्र स राक्षसः |  ४७   क
अभिदुद्राव वेगेन हन्तुकामो निशाचरः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति