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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
दुर्विज्ञेय़ा गतिर्नूनं कार्याणां कारणान्तरे |  १८   क
यद्वै लोकगुरुर्भूत्वा भवानेतां दशां गतः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति