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द्रोण पर्व
अध्याय ९६
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सञ्जय़ उवाच
इदमेति समुद्धूतं धार्तराष्ट्रस्य यद्वलम् |  १४   क
मामेवाभिमुखं तूर्णं गजाश्वरथपत्तिमत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति