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द्रोण पर्व
अध्याय ९६
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सञ्जय़ उवाच
शरदंष्ट्रो नरव्याघ्रो विचित्रकवचच्छविः |  २   क
मृगान्व्याघ्र इवाजिघ्रंस्तव सैन्यमभीषय़त् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति