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द्रोण पर्व
अध्याय ९६
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सञ्जय़ उवाच
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तस्य तेषां च धन्विनाम् |  २१   क
देवासुररणप्रख्यः प्रावर्तत जनक्षय़ः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति