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द्रोण पर्व
अध्याय ९६
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सञ्जय़ उवाच
आश्चर्यं तत्र राजेन्द्र सुमहद्दृष्टवानहम् |  २४   क
न मोघः साय़कः कश्चित्सात्यकेरभवत्प्रभो ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति