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द्रोण पर्व
अध्याय ९६
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सञ्जय़ उवाच
सम्भ्रान्तनरनागाश्वमावर्तत मुहुर्मुहुः |  २६   क
तत्सैन्यमिषुभिस्तेन वध्यमानं समन्ततः |  २६   ख
वभ्राम तत्र तत्रैव गावः शीतार्दिता इव ||  २६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति