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द्रोण पर्व
अध्याय ९६
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सञ्जय़ उवाच
चित्रसेनं शतेनैव दशभिर्दुःसहं तथा |  ३५   क
दुःशासनं च विंशत्या विव्याध शिनिपुङ्गवः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति