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अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
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वसिष्ठ उवाच
नैतस्येह यथास्माकमग्निहोत्रमनिर्हुतम् |  ४   क
साय़ं प्रातश्च होतव्यं तेन पीवाञ्शुनःसखः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति