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वन पर्व
अध्याय १०१
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विष्णुरु उवाच
ते प्रविश्योदधिं घोरं नक्रग्राहसमाकुलम् |  ९   क
उत्सादनार्थं लोकानां रात्रौ घ्नन्ति मुनीनिह ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति