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स्त्री पर्व
अध्याय ५
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विदुर उवाच
कश्चिन्महति संसारे वर्तमानो द्विजः किल |  ३   क
वनं दुर्गमनुप्राप्तो महत्क्रव्यादसङ्कुलम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति