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द्रोण पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तमिषुजालेन याज्ञसेनिः समावृणोत् |  ३५   क
विधूय़ तद्वाणजालं वभौ तव सुतो वली ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति