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शान्ति पर्व
अध्याय २४३
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व्यास उवाच
गन्धान्रसान्नानुरुन्ध्यात्सुखं वा; नालङ्कारांश्चाप्नुय़ात्तस्य तस्य |  १   क
मानं च कीर्तिं च यशश्च नेच्छे; त्स वै प्रचारः पश्यतो व्राह्मणस्य ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति