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कर्ण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
नासाध्यं विद्यते मेऽद्य त्वत्प्रिय़ार्थं विशेषतः |  ४३   क
सम्यग्धर्मानुरक्तस्य सिद्धिरात्मवतो यथा ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति