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भीष्म पर्व
अध्याय ९७
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सञ्जय़ उवाच
हतमाय़ं ततो रक्षो वध्यमानं च साय़कैः |  २७   क
रथं तत्रैव सन्त्यज्य प्राद्रवन्महतो भय़ात् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति