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शान्ति पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
गजाश्वदेहास्थिचय़ैः पर्वतैरिव सञ्चितम् |  ४   क
नरशीर्षकपालैश्च शङ्खैरिव समाचितम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति