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भीष्म पर्व
अध्याय ९७
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सञ्जय़ उवाच
समुत्सृज्याथ शैनेय़ो गौतमं रथिनां वरम् |  ४२   क
अभ्यद्रवद्रणे द्रौणिं राहुः खे शशिनं यथा ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति