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भीष्म पर्व
अध्याय ९७
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा पुत्रं तथा ग्रस्तं राहुणेव निशाकरम् |  ५३   क
अभ्यद्रवत शैनेय़ं भारद्वाजः प्रतापवान् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति