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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
नारदस्य वचः श्रुत्वा तानभ्यर्च्य द्विजर्षभान् |  ३२   क
सर्वान्विसर्जय़ामास ये तेनाभ्यागताः सह |  ३२   ख
गम्यतां द्वारकां चेति सोऽन्वशादनुय़ाय़िनः ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति