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द्रोण पर्व
अध्याय ९७
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सञ्जय़ उवाच
शरवर्षाणि मुञ्चन्तो विविधानि महारथाः |  १७   क
अभ्यद्रवन्त शैनेय़मसङ्ख्येय़ाश्च पत्तय़ः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति