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द्रोण पर्व
अध्याय ९७
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सञ्जय़ उवाच
ततो गजशिशुप्रख्यैरुपलैः शैलवासिनः |  ३२   क
उद्यतैर्युय़ुधानस्य स्थिता मरणकाङ्क्षिणः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति