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द्रोण पर्व
अध्याय ४४
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनेन तपस्तप्त्वा गन्धर्वेभ्यो यदाहृतम् |  २२   क
तुम्वुरुप्रमुखेभ्यो वै तेनामोहय़ताहितान् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति