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शल्य पर्व
अध्याय ३०
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युधिष्ठिर उवाच
धर्मतो याचमानानां शमार्थं च कुलस्य नः |  ५६   क
वार्ष्णेय़ं प्रथमं राजन्प्रत्याख्याय़ महावलम् ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति