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द्रोण पर्व
अध्याय ९७
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सञ्जय़ उवाच
यैस्तु दुःशासनः सार्धं रथैः पूर्वं न्यवर्तत |  ५५   क
ते भीतास्त्वभ्यधावन्त सर्वे द्रोणरथं प्रति ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति